झारसुगुड़ा। बढ़ते औद्योगिकीकरण को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने उड़ीसा पुनर्वास व थाईयान नीति-2006 को लागू किया है। भागीदारी व स्वच्छ प्रक्रिया के जरिये विकास को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार ने इसे लागू किया है और इसका प्रचार-प्रसार भी जोर-शोर से किया जा रहा है। विस्थापन को कम कर विस्थापित होने वालों की आवश्यकता को महत्व देना ही इसका मुख्य उद्देश्य है। इसी के साथ नयी नीति को सरकार की प्रगतिशील मानसिकता का परिचायक बताया जा रहा है, लेकिन विस्थापन की समस्या को लेकर 17 वर्ष पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने जो अभिमुख्य ग्रहण किया था, वह इस नयी नीति में नहीं है। ऐेसे में इस नीति को लेकर सवाल उठ रहे है। हीराकुद के विस्थापित हुए परिवार केवल झारसुगुड़ा ही नहीं बल्कि सोनपुर, बरगढ़, संबलपुर, देवगढ़ व सुंदरगढ़ आदि अन्य कई जिलों में जैसे-तैसे रह रहे है। वहीं उड़ीसा विद्युत उत्पादन निगम, ओपीजीसी वर्ष 1984 में जिले के ईब वैली बनहरपाली में स्थापित हुई थी। इस दो यूनिट वाले विद्युत उत्पादन केंद्र की स्थापना के लिए यहां रह रहे हीराकुद बांध से विस्थापित हुए लोगों को दुबारा यहां से विस्थापित किया गया। विस्थापित करने व उक्त विद्युत प्रकल्प से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को लेकर अंचल के जननेता प्रसन्न पंडा के नेतृत्व में जन आंदोलन भी किया गया था। इसी के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने वर्ष 1991 में यहां एक आम सभा में दुबारा विस्थापित होने वालों को दो गुणा क्षतिपूर्ति दिये जाने की घोषणा की थी, जो कि परिवर्तित समय में कार्यकारी कर राज्य के विस्थापन इतिहास में एक नया अध्याय बना था, लेकिन वर्तमान की राज्य सरकार ने कैसे बीजू बाबू की चिंता को नयी नीति में शामिल नहीं किया, यह शोचनीय है। जबकि वर्तमान की सरकार बीजू बाबू के नाम पर ही चल रही है। 14 मई 2006 को घोषित नयी नीति की धारा सात की उपधारा चार में जो परिवार एक से अधिक बार विस्थापित हुए है, उन्हे स्वाभाविक क्षतिपूर्ति राशि के अलावा उक्त राशि का 50 फीसदी अतिरिक्त क्षतिपूर्ति प्रदान किये जाने का उल्लेख किया गया है। अत: बीजू बाबू के नाम पर राज्य में शासन कर रही सरकार इस नयी नीति को परिवर्तन कर बीजू बाबू की विस्थापितों के प्रति दर्द को ध्यान में रखते हुए एक बार से अधिक विस्थापित होने वाले परिवार को दो गुणा क्षतिपूर्ति दिये जाने की पहल करे, ऐसी बात जिले के बुद्धिजीवियों द्वारा कही जा रही है।
बिंदापाथर (जामताड़ा)। करीब तीन दशक बीत जाने के बाद भी महत्वाकांक्षी अजय बराज योजना आजतक पूर्ण नहीं हो सकी। देवघर जिला स्थित सिकटिया से लेकर पश्चिम बंगाल की सीमा तक प्रस्तावित नहर निर्माण में कितने गरीब किसान की जमीन व जंगल उजाड़े गए, बावजूद आजतक किसानों को एक बूंद पानी नसीब नहीं हुआ। हां, इतना जरूर हुआ इस नहर योजना में अरबों रुपये का खेल खेला जा चुका है, जिससे ठेकेदार एवं अधिकारी मालामाल हो गए। इसमें सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि नहर में एक तरफ से काम किया गया तो दूसरी ओर से नहर पुन: पुरानी स्थिति में आ जाती है। इसी तरह का खेल वर्षो से चलता आ रहा है।
मालूम हो कि अस्सी के दशक में अजय नहर निर्माण कार्य आरंभ हुआ था तथा सिकटिया स्थित अजय नदी पर डैम बनाने की प्रक्रिया चालू हुआ। इसी डैम से नहर के माध्यम से किसानों के हजारों एकड़ जमीन सिंचाई की योजना बनाई गयी थी। लेकिन कुछ काम चलने के बाद योजना को बंद कर दिया गया। पुन: नब्बे के दशक में सरकार द्वारा इस नहर निर्माण को ले दो सौ करोड़ रुपये आवंटित किये गये। तब से आज तक काम चल रहा है, लेकिन योजना पूर्ण नहीं हो सकी।
कालिंजर (बांदा)। कालिंजर से मात्र तीन किलोमीटर दूर बागै नी के किनारे बसा गांव मसौनी व उसके इर्द-गिर्द बसे गांवों की खेती की सिंचाई हेतु सन् 1976 में पंप केनाल योजन लागू की गई थी जिसमें लाखों रुपए खर्च हुए। फिर भी बाइस साल से मामला खटाई में है। इसे साकार रूप नहीं दिया जा सका।
मसौनी व रामनगर के बीच प्रवाहित बागै नदी की उपयोगिता को देखते हुए सन् 76 में सिंचाई विभाग प्रखंड तृतीय मसौनी पंप केनाल योजना स्थापित की गई। 37 लाख रुपए की लागत की योजना का शिलान्यास तत्कालीन सिंचाई मंत्री मुमताज अहम खान ने किया था। शिलान्यास वर्ष 78 तक सर्वे कार्य चला। 1980 में नहर की खुदाई का कार्य भी शुरू हुआ। एक किलोमीटर तक नहर की पटरियां बना दी गई। इस नहर के निर्माण के दौरान गांव मसौनी व समीप के करीब पांच सौ किसानें की जमीनें भी अनुग्रहीत की गई। मुआवजा न दिए जाने के कारण उन्होंने कोर्ट का सहारा ले लिया। चकबंदी के दौरान मात्र कुछ ही किसानों की जमीनों का आंशिक मुआवजा दिया गया।
पंप केनाल के निर्माण के लिए नहर की खुदाई, मिट्टी का कार्य, टेल निर्माण पानी लिफ्ट के लिए पंप हाउस निर्माण का कार्य तीस लाख की सामग्री भी मौके पर डलवा दी गई। सुरक्षा के लिए चौकीदार भी नियुक्त किया गया। मगर निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया।
मसौनी गांव के पूर्व प्रधान, तुफैल भाई, वसीम अहम, रामेश्वर यादव आदि का कहना है कि इस पंप केनाल के असफल होने का कारण तत्कालीन अवर अभियंता की सर्वे रिपोर्ट की तकनीकी कमी है। सर्वे गलत होने से टेल ऊंची व नहर नीची हो गई। नहर को तीन क्यूसिक मीटर पानी की आवश्यकता थी।
योजना के ठप हो जाने के बाद जनता शासन कल में ग्राम विकास पंचायती मंत्री जमुना प्रसाद बोस को भी मौके पर लाया गया। उनका आश्वासन भी कोरा रहा।
सन् 1990 में मुलायम सिंह की सरकार में सिंचाई राच्य मंत्री अचल सिंह भी इस पंप केनाल को चालू कराए जाने का बीड़ा लेकर मौके पर आए मगर लखनऊ पहुंचते ही वह भी भूल गए। सन् 94 में क्षेत्रीय विधायक व परिवहन मंत्री डा. सुरेंद्र पाल वर्मा से ग्रामीणों ने सारी व्यवस्था सुनाई। जिन्होंने लखनऊ पहुंचकर विधानसभा में प्रश्न उठाया। कहा कि मसौनी पंप केनाल योजना दस सल से ठप है। सैकड़ों किसानों की जमीनें अनुग्रहीत कर ली गई। मुआवजा नहीं मिला। लाखों रुपए की सामग्री तहस नहस हो गई। उन्हें जवाब मिला कि सर्वे रिपोर्ट गलत हो जाने के कारण पंप योजन चलना असंभव है।
मंत्री डा. वर्मा ने सरकार को सुझाया किसानों को खुशहाल करने हेतु योजना में बदलाव लाकर डायवर्सन सिस्टम से क्षेत्र की सिंचाई की जाए। तत्कालीन सपा सरकार ने प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया। यह नई योजना भी पहल के अभाव में फाइलें में कैद रही।
बाइस साल बीत गए हैं। मसौनी वासी निराश हैं। उन्हें विश्वास नहीं रहा कि नई बदली योजना डायवर्सन सिस्टम से खेतों की सिंचाई हो सकेगी। ग्रामीणों का कहना है कि हमारी जमीनें भी बर्बाद हुई। अनुग्रहीत की गई। मुआवजा भी नहीं मिला। पंप केनाल भी चालू नहीं हो सका। विदित हो कि उक्त योजना के चालू हो जाने से मसौनी, भारतपुर, पहाड़ी माफी, लहद, पहाड़ी, सातौंगंज, गिरधरपुर, तलैया पुरवा की हजारों बीघे की भूमि सिंचित होती।
हरिद्वार। गंगा सहित देश की अन्य नदियों को मानव जनित प्रदूषण से बचाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। इस दिशा में गुरुकुल कांगड़ी विवि व आईआईटी का एक संयुक्त शोध महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। जिले में स्थित दोनों शीर्ष संस्थानों के विज्ञानियों ने स्लो सेंड फिल्टर (एसएसएफ) नामक बहुत कम खर्चीली व अधिक कारगर तकनीक विकसित की है। शोध कार्य को अंतिम रूप दिए जाने के बाद अमेरिका में आयोजित पर्यावरण विज्ञान एवं तकनीक पर आयोजित चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस में इसके प्रस्तुतीकरण का न्योता मिल चुका है।
गौरतलब है कि विस्तार लेती शहरी आबादी व बढ़ते औद्योगिकीकरण के चलते सिंचाई सहित अन्य कार्यो के लिए पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट की जरूरत भी बढ़ गई है, इसके लिये भारत में अपनाई जा रही प्रणाली महंगी होने के साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार पानी का शोधन नहीं कर पा रही है। इस दिशा में पिछले कुछ वर्र्षो से गुरुकुल कांगड़ी विवि के कुलसचिव व पर्यावरण विज्ञानी प्रो. एके चोपड़ा तथा आईआईटी रुड़की के प्रो. एए काजमी शोध कर रहे थे। अब इस शोध कार्य को लगभग अंतिम रूप देने के तुरंत बाद उन्हें 28 से 31 जुलाई तक अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजित पर्यावरण विज्ञान व तकनीकी पर आयोजित इंटरनेशनल कान्फ्रेंस में इसके प्रस्तुतीकरण का न्योता मिला है। प्रो. चोपड़ा के मुताबिक एसएसएफ तकनीक सीवेज के गहन ट्रीटमेंट के लिए तैयार की गयी है। वर्तमान में इस्तेमाल की जा रही तकनीक से निष्कासित पानी में बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं। इनकी संख्या एक लाख के लगभग होती है, जबकि यह मात्रा 100 एमएल में 1,000 से अधिक नहीं होनी चाहिए। एसएसएफ से शोधित पानी बैक्टीरिया को मानकों के अनुरूप ही साफ करता है। इस पद्धति की खासियत यह है कि यह बहुत कम खर्च में तैयार होने के बावजूद पुरानी पद्धति से कहीं अधिक कारगर है। इसमें न तो बिजली की खपत करनी पड़ती है और न ही महंगे उपकरणों की, इसके लिए आसानी से उपलब्ध रेत का ही उपयोग किया जाता है तथा यह बिना तकनीकी दक्षता वाले लोगों द्वारा भी संचालित की जा सकती है।
गोण्डा, 20 जुलाई : जरूरत पड़ी तो किसानों को फसल सिंचाई के लिए एक बूंद पानी नहीं मिला और जब बरसात के पानी से लबालब खेतों में पानी भरा हुआ है तो नहरों में भी पानी छोड़ दिया गया। इससे न सिर्फ गांवों में पानी घुस गया है, बल्कि सैकड़ों हेक्टेयर धान व गन्ने की फसल डूबने लगी है। यदि नहरों के इस उफान पर रोक नहीं लगायी गयी तो माझा के किसानों जैसी हालत उपरहर के किसानों की भी हो जायेगी।
घाघरा-शारदा नदियों को खतरे के निशान से ऊपर जाते देख कर्तिनयां के कैलाशपुरी बैराज से शुक्रवार की रात कई क्यूसेक पानी सरयू नहर में छोड़ दिया गया। शनिवार की दोपहर को जिले की सीमा में मनकापुर मुख्य नहर शाखा में तेजी से पानी का बहाव शुरु हो गया। शनिवार की रात को नहर पानी का बहाव इतनी तेज हो गया कि शाखा से निकलने वाली माइनर व रजबहे भी तेजी से बहने लगे।
मनकापुर शाखा से निकलने वाले माइनर बैजनपुर से मतवरिया, सालपुर, धनौली माइनर के इर्द-गिर्द बसे गांव रुद्रगढ़ नौसी, कर्मडीह, नौव्वागांव, मतवरिया, अचलपुर, भवानीपुर, फरेन्दा शुक्ल, कंचनपुर, तेलियानी पाठक, बिसवां गनेश, दत्तनगर विसेन, भटवलिया, भण्डहा, तुरकौलिया, कंधरातेजी, संदेशवा, पण्डरी कृपाल, लालचन्द्र पुरवा, तुर्काडीहा, नरौरा अर्जुन, रमवापुर गोविन्दा, धनौली, भटपुरवा, सिसई टिकरिया, निगवा बोध, सालपुर सेमरा, विसुनपुर बैरिया, भूराडीहा, बेलावां, कपिसा, सिसउर अन्दूपुर, दरियापुर चौबे समेत कई मजरों में स्थित सैकड़ों हेक्टेयर धान की फसल डूब गयी है। गन्ने की फसल जलमग्न हो गयी है। इस जलजमाव से मक्का, अरहर आदि फसलों की बोआई अब नहीं हो पायेगी। लगातार बरसात होने से किसानों की खेती पहले से ही जगमग है। ऊपर से नहर के उफान ने किसानों को बरबाद करने का कार्य शुरु कर दिया है। किसानों का कहना है कि यदि नहर के पानी को बन्द नहीं किया गया तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। गत वर्ष भी धान कटाई के समय पानी छोड़े जाने से सैकड़ों हेक्टेयर धान की पकी फसलें खेतों में ही सड़ गयी थीं। इस सम्बंध में अपर जिलाधिकारी सुखलाल भारती ने कहा कि नहर में इतनी अधिक मात्रा में पानी कैसे छोड़ा गया इसकी जांच करायी जायेगी। उन्होंने सिंचाई विभाग से नहर में पानी छोड़े जाने का ब्यौरा मांगा है।
देहरादून। यह कहना तो शायद अभी जल्दबाजी होगी कि नदियों की सफाई का एक सस्ता, सुलभ उपाय आंखों के सामने है। यह लेकिन कहा जा सकता है कि गंदे पानी को निर्मल करने की यह योजना, जो देश में एक जगह सफलता से लागू है, केंद्र और राज्य सरकारों का ध्यानाकर्षण और शोध चाहती है। यह तरीका है सरकंडे की झाड़ियों से पानी शुद्ध करना।
जो सरकंडा कलम बनाने से लेकर छप्पर डालने तक में काम आता रहा है, उसमें पानी साफ करने की भी अद्भुत क्षमता है। हिमाचल की एक सीमेंट फैक्ट्री में इसकी मदद से पानी को साफ किया जा रहा है। दिल्ली विकास प्राधिकरण राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली की हरियाली बढ़ाने और यमुना में गिरने वाले गंदे नालों को प्रदूषणमुक्त करने के लिए भारतीय वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के पारिस्थितिकी व पर्यावरण डिवीजन की मदद ले रहा है। डिवीजन की अध्यक्ष डा. प्रफुल्ल सोनी कहती हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों को छोड़ कर देश भर में मिलने वाली सरकंडा या नरकट घास नदियों में प्रदूषण कम करने के लिए रामबाण हो सकती है।
पानी साफ करने की इस तकनीक का नाम है रूट जोन ट्रीटमेंट और यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मान्यता प्राप्त है। डा. सोनी के अनुसार इस तकनीक में सीवर के मुहाने पर एक तालाब बनाया जाता है। इसमें नीचे रोड़ी और ऊपर रेत की परत बिछाई जाती है। इसके ऊपर फ्रैगमाइटस करका यानी सरकंडे की घास लगायी जाती है। इसके बाद गंदे पानी को इस तालाब से गुजारा जाता है। सरकंडे का तना खोखला होता है, जो रुके हुए पानी को आक्सीजन देता है। आक्सीजन से पानी में बैक्टीरिया पनपते हैं और वही पानी साफ करते हैं। डा. सोनी बताती हैं कि यह प्रयोग हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के बरमाणा की एक ब्रांडेड सीमेंट फैक्ट्री में हो चुका है। कई देशों में यह काम सफलतापूर्वक किया जा रहा है। छोटे स्तर पर इस तकनीक में सात से आठ लाख रुपये का खर्च आता है। उज्जैन के प्रोफेसर बेल्लारी और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बृजगोपाल भी इसका सफल प्रयोग कर चुके हैं। डा सोनी कहती हैं कि नगरों के सीवेज का रूट जोन ट्रीटमेंट किया जाए, तो महंगे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के खर्च से बचा जा सकता है और नदियों को काफी हद तक प्रदूषण मुक्त भी कर सकते हैं।