भरमौर (चंबा)। उपमंडल में निर्माणाधीन सत्तर मेगावाट क्षमता की विद्युत परियोजना के निर्माण के दौरान यहां घरेड़, सेरी व फनार के दर्जनों घरों की दीवारों व छतों में दरारें आ गई है। इन गांवों के नीचे से गुजर रही सुरंगों को बनाने के लिए जो ब्लास्टिंग की गई थी, उससे इन भवनों में दरारें आई हैं। जिसके लिए स्थानीय निवासियों ने प्रशासन व कंपनी प्रबंध से भी शिकायत की लेकिन प्रभावित परिवारों को कोई भी आश्वासन तक नहीं मिला है। लेकिन अब जबकि बर्फबारी शुरू हो गई है। तो इसने अपना प्रभाव भी दिखाना भी शुरू कर दिया है। जिन घरों के लैंटरों में दरारें आई हैं उनमें से अब पानी टपकना शुरू हो गया है। सेरी गांव के नाथो राम, घरेड़ के थुनिया राम, सोनू कुमार ने बताया कि अब घर की छत से सारा पानी अंदर टपक रहा है। जिसके चलते वह दूसरे घर में रहने को बाध्य हैं। इन लोगों ने मांग की है कि कंपनी उनके घरों की तुरंत मरम्मत करवाकर दे।
सैंज ;पार्वती परियोजना के द्वितीय चरण के अंतर्गत बनाए जा रहे 820 मेगावाट बिजली उत्पादन वाले सिउंड पावर हाउस के निर्माण कार्य से रैला पंचायत के आधा दर्जन गांव के 250 परिवारों को कई प्रकार की परेशानियों हो रहीं है। उल्लेखनीय है कि पावर हाउस निर्माण के पहाड़ी के कटान कार्य इन दिनों एनएचपीसी की सवलेटिंग गैमन कंपनी की ओर से जोरों पर किया जा रहा है। निर्माण कार्य के दौरान पहाड़ी की खुदाई से उड़ने वाली धूल से साथ लगते जीवा, शुलगा, खडोआ, बागीधार, रूमसू व रैला के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। निर्माण कार्य में भारी विस्फोटक पदार्थ का प्रयोग करने से लोगों के घरों को नुकसान हो रहा है। इससे ग्रामीण भारी परेशानी के बीच जीने को मजबूर हैं। ग्रामीण राजेश शर्मा ने बताया कि पावर हाउस निर्माण कार्य से उठने वाली धूल से पावर हाउस के सौ मीटर दूर जीवावासी भी परेशानी है। उन्होंने बताया कि धूल से उपजाऊ जमीन बांझ बन गई है व मिट्टी युक्त घास खाने से पशुओं में कई प्रकार की बीमारियां होने लगी है। घरों के अंदर आती धूल खाद्य पदार्थो पर पड़ती है। इससे लोगों को गले व पेट की बीमारियां हो रही हैं। पंचायत प्रधान रूम सिंह का कहना है कि परियोजना प्रबंधक ग्रामीणों की समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं।
ग्रामीणों में पनप रहा रोष
आशापूरी विकास संगठन रैला के उप प्रधान इंद्र सिंह ने बताया कि ग्रामीणों को प्रशासन व एनएचपीसी के प्रति भारी रोष है। दो दिन के भीतर प्रबंधन ने पावर हाउस स्थल सिउंड व आस पास के गांवों में पानी छिड़काव की व्यवस्था नहीं की तो ग्रामीण सड़कों पर उतर जाएंगे। इस संदर्भ में नायब तहसीलदार सैंज व एनएचपीसी प्रबंधन को लिखित सूचना दी गई है।
नूरपुर (कांगड़ा)पौंग बांध विस्थापित संघर्ष समिति की कार्यकारिणी की बैठक वीरवार को राजा का तालाब स्थित भू अर्जन अधिकारी कार्यालय की बगल में संपन्न हुई। इस बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष अश्रि्वनी कुमार अवस्थी ने की। बैठक में समिति के सदस्यों ने अपनी समस्याओं पर चर्चा की और अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए आगामी रणनीति बनाई। इस मौके पर संघर्ष समिति के अध्यक्ष अश्वनी कुमार अवस्थी ने पौंग बांध विस्थापितों को संबोधित करते हुए कहा कि 1972 में बीस हजार सात सौ बाईस लोग विस्थापित हुए थे और सोलह हजार एक सौ लोगों की जमीनें पौंग बांध में गई थीं लेकिन सरकारों ने इन पौंग बांध विस्थापितों को आज दिन तक न तो वादे के मुताबिक राजस्थान में मुरब्बे उपलब्ध करवाए हैं और न ही विस्थापितों को मकान राजस्थान में मिल पाए हैं इस लिए पौंग बांध विस्थापित पिछले पैंतीस वर्षो से कई तरह की समस्याओं का खामियाजा भुगत रहे हैं, लेकिन कोई भी सरकार विस्थापितों की समस्याओं का हल करवाने में कामयाब नहीं हो पाई है।
अश्रि्वनी कुमार ने कहा कि सरकारों ने कुल नौ हजार पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में बसाया था, लेकिन अब उन्हें उजाड़ दिया गया है क्योंकि जो आरक्षित भूमि पौंग बांध विस्थापितों को अलाट हुई थी वहां पर विस्थापितों को जमीन उपलब्ध करवाए जाने की बजाय जैसलमेर में दी गई है वहां पर इन लोगों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। संघर्ष समिति के अध्यक्ष का कहना है कि बीस साल तक संघर्ष करने के बाद भी पौंग बांध विस्थापितों को न्याय नहीं मिल पाया था और बाद में वह अपनी मांगों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में गए थे। हालांकि सर्वोच्च न्यायलय ने फैसला उस वक्त पौंग बांध विस्थापितों के पक्ष में दिया था, लेकिन आज दिन तक हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने इस फैसले पर कोई भी निर्णय लिया है इस लिए विस्थापितों को अपनी समस्याओं के कारण दर दर भटकना पड़ रहा है।
समिति प्रधान ने कहा कि 2001 में एक बार फिर विस्थापित अपनी समस्याओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में गए वहां पर यह मुकदमा 2004 तक चलता रहा और एक फिर सर्वोच्च न्यायालय ने यह मामला उच्च न्यायलय को सौंप दिया। उच्च न्यायालय ने आगे इस मामले की सुनवाई करने के लिए 26 अक्टूबर 2005 को हाई पावर कमेटी को भेज दिया। मगर 11 साल में 12 बैठकें हाई पावर कमेटी की हो गई हैं, लेकिन विस्थापितों के पक्ष में आज तक कोई भी निर्णय नहीं लिया गया है। इसी के चलते पौंग बांध विस्थापितों ने संघर्ष समिति का गठन करके अपने हकों की लड़ाई लड़ने के लिए बिगुल फूंक दिया है। समिति प्रधान का कहना है कि समिति एक बार फिर अपनी समस्याओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाली है और अगर फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो पौंग बंाध विस्थापित संघर्ष की राह अपनाएंगे। प्रधान ने कहा कि हिमाचल सरकारें विस्थापितों को गंगानगर में मुरब्बे कागजों में ही दिलाती रही हैं, लेकिन हकीकत में कोई भी सरकार विस्थापितों को मुरब्बे नहीं दिला पाई हैं।
इस मौके पर समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राम लोक शर्मा, उपाध्यक्ष योगेंद्र पठानिया, महासचिव एके शर्मा, कोषाध्यक्ष कर्म सिंह पठानिया, संयुक्त सचिव स्वरूप सिंह, संगठन सचिव देश राज, प्रचार सचिव रोशन लाल, मुख्य सलाहकार तीर्थ राम, कुलवीर सिंह, रघुवीर सिंह इत्यादि मौजूद थे।